कभी आंसू कभी खुशी बेची
हम गरीबों ने बेक्सी बेची
चंद सांसे खरीदने के लिए
रोज थोड़ी सी जिंदगी बेची
शाम को थककर टूटे झोपड़ी में सो जाता है
वो मजदूर हो शहर में उच्चि इमारतें बनाते है
ये गंदगी तो महल वाले ने फैलाई है साहब
वरना गरीबों तो सड़कों से थैलियां
तक उठा लेते है
गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है
इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है
चेहरे कोई बे नकाब हो जाएंगे
ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है
वो जिनके हाथ में हर वक्त छाले रहते है
आबाद उन्हीं के दम पर महल
वाले रहते है
खिलौना समझ कर खेलते जो रिश्तों से
उनके निजी ज्जबात ना समझो तो अच्छा है
बाढ़ के पानी में बह गए छपर जिनके
कैसे गुजारी रात ना पूछो तो अच्छा है
अमीर की बेटी जितना पलर में दे आती है
गरीब की बेटी उतना अपने ससुराल में ले जाती है
वो राम की खिचड़ी भी खाता है
वो रहीम की खीर भी खाता है
वो भूख है जनाब उसे
कहां मजहब समझ आता है
गरीबों की बच्चे भी कहा सके त्योहार में
तभी तो भगवान खुद बिक जाते बाज़ार में
उसने ये सोच कर अलविदा कहा होगा
गरीब लोग मोहब्ब्त के सिवा दे क्या सकते है
छीन लेता है मुझसे हर चीज ये खुदा
क्या तु मुझसे भी गरीब है
वो रोज़ रोज़ नहीं जलता साहब
मंदिर का दिया थोड़े ही है
गरीब का चूल्हा हैं
अमीर के छत पर बैठा कावा भी मोर लगता है
गरीब का भिखा बच्चा भी चोर लगता है
बहुत जल्द सीख लेता हूं ज़िन्दगी का सबक
गरीब बच्चा हूं बात बात और जिद नहीं करता
डोली चाहे अमीर के घर से उठे चाहे
गरीब के चौखट एक बाप की ही सूनी होती है
गरीब भूख से मरे तो अमीर आहो से मर गए
इनसे जो बच गया वो झूठे रिवाज़ो से मर गए
किस्मत खराब बोलने वाले कभी गरीब
से बैठ कर पूछना ज़िन्दगी क्या है
जनाजा बहुत भारी थी उस गरीब का
शायद सारे अरमान साथ लिए जा रहा था
तहाजीवो का मिशाल गरीबों के घर पे है
दुपट्टा फटा हुआ है मगर उनके सर पे है
खुदा के दिल को भी सुकून आता होगा
जब कोई गरीब चेहरा मुस्कुराता होगा
घर में चूल्हा जल सके इसलिए कड़ी
धूप में जलते देखा है
है मैंने गरीब की सांस को गुब्बारों में
बिकते देखा है
राहों में काटे थे फिर भी वो चलना सीख गया
वो गरीब का बच्चा था
हर दर्द में जीना सीख गया
सब कुछ तो है तेरे पास तुझे ये
जमाना क्यों खलता है
मिलेगा जो नसीब में है खुदा का
लिखा कहां टलता है
घर गुलजार सुने सहर
बस्ती बस्ती में कैद हर हस्ती हो गई
आज फिर ज़िन्दगी महंगी
और दौलत सस्ती हो गई
घटाएं आ चुकी है आसमां पे
और दिन सुहाने है
मेरी मजबूरी तो देखो मुझे बारिश में भी
कागज कमाने है
उन घरों में जहां मिट्टी के घड़े रहते है
कद में छोटे मगर लोग बड़े रहते है
पेट की भूख ने ज़िन्दगी के
हर एक रंग दिखा गए
जो अपना बोझ उठा ना पाए
पेट की भूख ने पत्थर उठावा दिए
रोज शाम मैदान में बैठे ये कहते हुए
एक बच्चा रोता है
हम गरीब है इसलिए हम गरीब का
कोई दोस्त नहीं होता है
गरीबों को गरीब कर दिया
ये सियासत तूने भी
इस दौर मै कमाल कर दिया
गरीबों को गरीब अमिरो को माला माल
कर दिया
आज तक बस एक ही बात समझ नहीं आती
जो लोग गरीबों के हक के लिए लड़ते है
वो कुछ वक्त के बाद अमीर कैसे बन जाते है
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